सफर इंसानियत insaniyat ka safar
इंसान अपने सफर में हमा वक़्त लगा रहता है। चाहे वो जैसा भी हो अच्छा, बुरा , नेक, बाद , बाद एखलाक , खुश एखलाक जैसा भी हो इंसान जब पैदा होता है उसी वक़्त से अपना सफर तय करते रहता है लेकिन बात ये है कि सफरे इंसानियत पे कौन लोग है। कौन लोग इंसानियत की मंज़िल से गुज़र रहे है अगर इस दौर के लोगों को देखा जाय तो इंसान दूर दूर तक नज़र नहीं आते तो इंसानियत का सफर कहाँ से मिलेगा।
इंसान नज़र नही आने का मतलब इंसान तो सड़को पे, अपने घरों में, दरवाजों पर, हर जगह हैवान बने बैठे है। इंसान तो अपनी इंसानियत ही भूल गई है।
मेरी बात पे यकीन न हो तो आप एक बार अपने रोज़ मररह की ज़िंदगी मे आस पास के लोगों को देख लीजिए कई लोग ऐसे है जिनके घर से 1k g से ज़ियादा रोटी चावल डेली फेंक दिया जाता है वही हमारे पड़ोस में रहने वाले को एक वक़त की रोटी भी नसीब नही तो हम कैसे कहें कि हम इंसानियत की राह पे चल रहे है हम दिखावट के हिसाब से तो इंसान है लेकिन इंसान की शक्ल में हैवान बने बैठे है।
इंसान अपनी इंसानियत भुला बैठा है इसीलिए डायरेक्ट बड़ा करने की बात करते है। उनके बात में लॉजिक नही होता।
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